दोस्त का फ़रेब

गरचे हूँ दीवाना, पर क्यों दोस्त का खाऊँ फ़रेब

आस्तीं मे दश्ना पिन्हा, हाथ में नश्तर खुला

– मिर्ज़ा ग़ालिब