दोपहर के खाने के बाद

(कविता – हैरॉल्ड पिंटर)

और दोपहर के बाद आते हैं सजे-धजे प्राणी
लाशों में सूंघने के लिए
और करने के लिए अपना भोजन

और तोड़ लेते हैं ये ढेर से सजे-धजे प्राणी
फूले हुए नाशपाती धूल से
और मिनेस्त्रोन-सूप हिलाते हैं बिखरी हड्डियों से

और जब हो जाता है भोजन
वे वहीं पसर जाते हैं आराम से
निथारते हुए लाल मदिरा को सुविधाजनक खोपड़ियों में

अनुवादक: अनिल एकलव्य

Author: anileklavya

मैं सांगणिक भाषाविज्ञान (Computational Linguistics) में एक शोधकर्ता हूँ। इसके अलावा मैं पढ़ता हूँ, पढ़ता हूँ, पढ़ता हूँ, और कुछ लिखने की कोशिश भी करता हूँ। हाल ही मैं मैने ज़ेडनेट का हिन्दी संस्करण (http://www.zmag.org/hindi) भी शुरू किया है। एक छोटी सी शुरुआत है। उम्मीद करता हूँ और लोग भी इसमें भाग लेंगे और ज़ेडनेट/ज़ेडमैग के सर्वोत्तम लेखों का हिन्दी (जो कि अपने दूसरे रूप उर्दू के साथ करोड़ों लोगों की भाषा है) में अनुवाद किया जा सकेगा।

3 thoughts on “दोपहर के खाने के बाद”

  1. बहुत सुंदर…आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

  2. ब्लोगिंग की दुनिया में आपका स्वागत है. मेरी कामना है की आपके शब्दों को नई ऊंचाइयां और नए व गहरे अर्थ मिलें और विद्वज्जगत में उनका सम्मान हो.
    कभी समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर एक नज़र डालने का कष्ट करें.
    http://www.hindi-nikash.blogspot.com

    सादर-
    आनंदकृष्ण, जबलपुर.

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