बरकत है भूख की

करतब के बर्तन में बरकत है भूख की
फिर भी ना खाए तो हरकत है मूर्ख की

करता है बरगद साल-दर-साल कदमताल
ये क़वायद है लेने को मरघट के हाल-चाल

सरपट चले जाने की यहाँ पर है परिपाटी
फ़ुरसत नहीं सोचें कितनी हरी थी ये घाटी

गफ़लत का मफ़लर रहता है गर्म हर दम
शर्म के लिहाफ़ के ना होने का क्यों हो ग़म

पनघट पर बिल्कुल भी नहीं मिलता है पानी
पानी तो पनघट से लाती थी नानी की नानी

खुदा का ये मुद्दा क्या नहीं लगता है बेहूदा
तदबीर और तकदीर की तस्वीर जो है बेहूदा

सवाल नहीं काफ़ी और जवाब भी नहीं काफ़ी
सवाल-जवाब जोड़ी में खरीद लाओ तो माफ़ी

दिल हलाक़, दिमाग़ क़त्ल, बदन से नहीं है सम
पल भर को लेने दो दम, साँस अब बची है कम

 

[2009]

Author: anileklavya

मैं सांगणिक भाषाविज्ञान (Computational Linguistics) में एक शोधकर्ता हूँ। इसके अलावा मैं पढ़ता हूँ, पढ़ता हूँ, पढ़ता हूँ, और कुछ लिखने की कोशिश भी करता हूँ। हाल ही मैं मैने ज़ेडनेट का हिन्दी संस्करण (http://www.zmag.org/hindi) भी शुरू किया है। एक छोटी सी शुरुआत है। उम्मीद करता हूँ और लोग भी इसमें भाग लेंगे और ज़ेडनेट/ज़ेडमैग के सर्वोत्तम लेखों का हिन्दी (जो कि अपने दूसरे रूप उर्दू के साथ करोड़ों लोगों की भाषा है) में अनुवाद किया जा सकेगा।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.