काल-कविता

अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
ज़ोर-ज़ोर से
रगड़-रगड़ रगड़-रगड़
इतना करता
शोर मगर शोर मगर
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़

क्यूँ? कुछ हुआ क्या?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।

करना था इसे
जगर-मगर जगर-मगर
करते जाते
अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
बोल-तोल से
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़

टुकड़े-टुकड़े
तितर-बितर तितर-बितर
बुरा है लेकिन
हशर-बशर हशर-बशर
हाथों में पड़ गए
छाले मगर छाले मगर
कतर-कतर कतर-कतर

बोलो भाई, पहुँचे क्या?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।

अगड़-मगड़ अगड़-मगड़
चलती जाती
लपड़-झपड़ लपड़-झपड़

अब तो बहुत देर हो आई
कुछ और नहीं क्या भाई?
नहीं, नहीं। अभी नहीं।

बहे जा रही
लाल-लाल
ज़हर-लहर ज़हर-लहर
चले जा रही
इधर-उधर इधर-उधर
मोड़-तोड़ से
अगड़-मगड़ अगड़-मगड़

बोलो भाई
तुम तक पहुँची क्या?

नहीं, नहीं। अभी नहीं।

 

[2009]

Author: anileklavya

मैं सांगणिक भाषाविज्ञान (Computational Linguistics) में एक शोधकर्ता हूँ। इसके अलावा मैं पढ़ता हूँ, पढ़ता हूँ, पढ़ता हूँ, और कुछ लिखने की कोशिश भी करता हूँ। हाल ही मैं मैने ज़ेडनेट का हिन्दी संस्करण (http://www.zmag.org/hindi) भी शुरू किया है। एक छोटी सी शुरुआत है। उम्मीद करता हूँ और लोग भी इसमें भाग लेंगे और ज़ेडनेट/ज़ेडमैग के सर्वोत्तम लेखों का हिन्दी (जो कि अपने दूसरे रूप उर्दू के साथ करोड़ों लोगों की भाषा है) में अनुवाद किया जा सकेगा।

6 thoughts on “काल-कविता”

    1. कौतुक जी,

      तारीफ़ में पोस्ट लिखा जाना तो सम्मान की बात है। तर्क से तो मैं परिचित हूँ (खुद भी दिया है), लेकिन उसके लिए यह नाम (ठक-ठक तर्क) अच्छा है।

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