हक़

कोई मेरे पास आए
साथ चलने के लिए
और मैं उसे भगा दूँ
दुत्कार कर
फटकार कर
सबके सामने
बेइज्जत कर के

तब भी अगर वो ना जाए
तो मैं उसके होने को ही
नज़रअंदाज़ कर के दिखा दूँ

वो बार-बार आता रहे
और मैं बार-बार यही करूँ
तो क्या मुझे हक़ बनता है
उसे दोष देने का
इसलिए कि उसने साथ नहीं दिया
इसलिए कि वो अब साथ नहीं चल रहा
जबकि मेरी खुद की सांठ-गांठ उन्हीं से है
जिनकी यातना और दुत्कार से बचते हुए
वो मेरे पास आया था

साथ चलने के लिए
इसलिए कि किसी और को
यातना और दुत्कार दिए जाने से रोका जा सके

जबकि मुझे यही नहीं पता
कि वो क्या कर रहा है
और क्यों कर रहा है

किसी के सारे रास्ते बंद करके
(दुनिया से ही टिकट कटा लेने को छोड़ कर)
क्या कोई किसी को पाठ पढ़ा सकता है
कि जीवन कैसे जिया जाए
कि नैतिकता के मानदंड क्या हैं?

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