ईश्वर का साथ हमारे साथ

(गीत: बॉब डिलन)

मेरा नाम, अरे, कुछ नहीं है
मेरी उम्र का अर्थ और भी कम
मैं जिस देश से आया हूँ
उसको सब कहते हैं मिडवेस्ट
मुझको वहाँ यह पढ़ाया और सिखाया गया
कानून की राह पर चलना
और यह कि जिस देश में मैं रहता हूँ
ईश्वर का साथ उसके साथ है

अरे भाई, इतिहास की किताबें बताती हैं
और इतना बढ़िया बताती हैं
घुड़सवारों ने धावा बोला
और इंडियंस कट गए
घुड़सवारों ने धावा बोला
और इंडियंस मर गए
अरे, देश तब जवान था
और ईश्वर का साथ उसके साथ था

अरे स्पेनी-अमरीकन युद्ध
का भी अपना समय था
और गृह-युद्ध को भी जल्दी ही
पीछे को छोड़ दिया गया
और नायकों के नामों को भी
मुझको रटवाया गया
उनके हाथ ज्यों बंदूकें थीं, वैसे ही
ईश्वर का साथ उनके साथ था

अरे, प्रथम विश्व-युद्ध का भी, यारों
समय आया और चला गया
लड़ाई का कारण लेकिन
मेरे पल्ले कभी नहीं पड़ा
पर मैंने उसे मानना सीख लिया
और मानना भी गर्व के साथ
क्योंकि अपन मरों को नहीं गिनते
जब ईश्वर का साथ अपने साथ हो

जब दूसरा विश्व-युद्घ भी
अपने अंजाम को पा गया
हमने जर्मनों को माफ़ कर दिया
और अपना दोस्त बना लिया
चाहे साठ लाख की उन्होंने हत्याएँ की हों
उनको भट्टियों में झुलसा कर
अब जर्मनों के लिए भी
ईश्वर का साथ उनके साथ था

मैंने रुसियों से घृणा करना सीख लिया
अपनी पूरी ज़िंदगी के लिए
अगर एक और युद्ध होता है
हमें उनसे लड़ना ही होगा
उनसे घृणा करनी होगी और डरना होगा
भागना होगा और छिपना होगा
और यह सब बहादुरी से मानना होगा
ईश्वर का साथ अपने साथ रख कर

पर अब हमारे पास हथियार हैं
जो रासायनिक रेत से बने हैं
अगर उन्हें पड़ता है किसी पर दागना
तो दागना तो हमें पड़ेगा ही
एक बटन का दबाना
और एक धमाका पूरी दुनिया में
और तुम सवाल कभी नहीं पूछोगे
जब ईश्वर का साथ तुम्हारे साथ हो

अनेक अंधेरी घड़ियों में
मैंने इस बारे में सोच के देखा है
कि ईसा मसीह के साथ विश्वासघात
एक चुंबन के साथ हुआ था
पर मैं तुम्हारे लिए नहीं सोच सकता
तुम्हें खुद ही तय करना होगा
कि क्या जूडस इस्कैरियट
के भी साथ ईश्वर का साथ था

तो अब जब मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ
मैं ऊब और उकता चुका हूँ
जिस संभ्रम में मैं फँसा हूँ
कोई ज़बान जो है बता नहीं सकती
शब्दों से मेरा सिर भरा है
और नीचे फ़र्श पर भी वो गिरे हैं
अगर ईश्वर का साथ हमारे साथ है
तो वो अगले युद्ध को रोक देगा

हक़

कोई मेरे पास आए
साथ चलने के लिए
और मैं उसे भगा दूँ
दुत्कार कर
फटकार कर
सबके सामने
बेइज्जत कर के

तब भी अगर वो ना जाए
तो मैं उसके होने को ही
नज़रअंदाज़ कर के दिखा दूँ

वो बार-बार आता रहे
और मैं बार-बार यही करूँ
तो क्या मुझे हक़ बनता है
उसे दोष देने का
इसलिए कि उसने साथ नहीं दिया
इसलिए कि वो अब साथ नहीं चल रहा
जबकि मेरी खुद की सांठ-गांठ उन्हीं से है
जिनकी यातना और दुत्कार से बचते हुए
वो मेरे पास आया था

साथ चलने के लिए
इसलिए कि किसी और को
यातना और दुत्कार दिए जाने से रोका जा सके

जबकि मुझे यही नहीं पता
कि वो क्या कर रहा है
और क्यों कर रहा है

किसी के सारे रास्ते बंद करके
(दुनिया से ही टिकट कटा लेने को छोड़ कर)
क्या कोई किसी को पाठ पढ़ा सकता है
कि जीवन कैसे जिया जाए
कि नैतिकता के मानदंड क्या हैं?

इंकलाब के पहले

अन्याय हर तरफ फैला है
पूंजी का बोलबाला है
सच का सर्वत्र मुँह काला है

ये हालात तो बदलने ही होंगे
बदलाव के हालात बनाने होंगे

तभी तो इंकलाब आएगा
हर जन अपना हक पाएगा

पर उसके पहले बहुत से काम
जो अभी तक पूरे नहीं हुए
वो सब के सब निपटाने होंगे

वो कोने में जिसे अधमरा करके
बड़े दिनों से डाल रखा है
वो अब भी, हद है आखिर,
कभी-कभार बड़-बड़ किए रहता है

उसे सबक सिखाना होगा
उसके भौंकने को बंद कराना होगा
पहला बड़ा काम तो यही है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

फिर आपस के झगड़े भी तो हैं
तगड़े हैं, एक से एक बढ़ के हैं
एक-दूसरे को सबक सिखाना होगा
एक-दूसरे का भौंकना बंद कराना होगा

दूसरा बड़ा काम यह भी तो है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

फिर कुछ डरे सहमे
असुरक्षित लोगों ने
अपनी बुद्धि का
अपने ज्ञान का
और तो और
अपनी प्रतिभा का!
(हद है!, हद है!
कितनी अकड़ है!)
आतंक फैला रखा है
यहीं, इंकलाबियों के बीच!

उनका मटियामेट कर के ही
सच्चे इंकलाबी दम ले सकते हैं
उन्हें अपने साथ लाकर नहीं

एक तीसरा बड़ा काम यह जो है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

ऐसे कितने ही काम और हैं
जिन्हें निपटाना है
इंकलाब के पहले

इसी से याद आया
एक काम तो यही है
कि इन कामों में
जो अड़चन पहुँचाए
उसे हड़का-हड़का के
आपसी झगड़े
ज़रा देर को भुला के
मिल-जुल कर
ऊपर पहुँचाया जाए

इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

नीरस नाम की रोचक कहानी

7 जनवरी, 2011

(मूल लेख)

ज़ेड नेट या ज़ी नेट, आप अंग्रेज़ी वर्णमाला के आखिरी अक्षर को जिस भी तरह उच्चारित करते हों (जो इस पर निर्भर करता है कि आप पिछले साम्राज्य के प्रभाव में पले हैं या नये वाले के), का हिन्दी संस्करण शुरू किए अब चार साल से ऊपर हो गए हैं। एकदम ठीक तारीख दी जाए तो 1 दिसंबर, 2006 को हिन्दी ज़ेड नेट की वेबसाइट शुरू हुई थी। तब से काफ़ी कुछ बदल गया है। ज़ेड नेट खुद अब ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स बन गया है, जिसका एक प्रमुख भाग फिर भी ज़ेड नेट है।

हिन्दी संस्करण की शुरुआत इस तरह हुई थी कि अपन ज़ेड नेट अक्सर पढ़ते रहते थे और एक दिन अपन ने देखा कि इसके कुछ अन्य भाषाओं में भी संस्करण हैं। पाठकों-उपयोक्ताओं के लिए लिखा गया एक निमंत्रण सा भी दिखा कि अगर आप इनमें से किसी में सहयोग देने या एक नई भाषा के संस्करण की शुरुआत करने में रुचि रखते हैं तो संपर्क करें। अपने को लगा कि भाई हिन्दी में भी इसका एक संस्करण होना ही चाहिए, तो अपन ने माइकल स्पैनोस, जिनका नाम संपर्क के लिए दिया था, उन्हें एक मेल लिख डाली। जवाब आया और ज़ेड नेट के लेखों का अनुवाद करके हिन्दी संस्करण की वेबसाइट बनाने का काम शुरू हो गया। पाँच लेखों के अनुवाद से शुरुआत हुई, जो नोम चॉम्स्की, माइकल ऐल्बर्ट, अरुंधति रॉय, जॉर्ज मॉनबिऑट तथा तारिक़ अली के लिखे हुए थे। उस समय वेबसाइट ज़ेड नेट के ही सर्वर पर बनाई गई थी, क्योंकि हिन्दी ज़ेड नेट के लिए अलग से कोई इंतज़ाम नहीं था।

बाद में कुछ अन्य लेखों के भी अनुवाद किए, मगर और कामों से समय निकाल कर उतना नहीं हो पाया जितना सोचा था। फिर भी धीरे-धीरे चलता रहा। उम्मीद यह थी कि अन्य लोग भी अनुवाद में सहयोग देने के लिए मिलेंगे, पर एकाध लेख के अलावा कोई और अनुवाद करने वाला नहीं मिला, लिहाजा एक व्यक्ति से जो हो सका वही होता रहा। एक समस्या यह भी थी कि हिन्दी की अपनी वेबसाइट न होने के कारण कुछ भी करने (चाहे टाइपिंग की कोई गलती सुधारने जैसी ज़रा सी बात ही हो) में भी काफ़ी समय लग जाता था क्योंकि ज़ेड नेट की वेबसाइट भी जिन लोगों के सहारे चल रही है, उनके पास भी पहले से ही बहुत से काम हैं और वे अन्य गतिविधियों में भी अपना समय देते हैं। और यह कोई व्यावसायिक मीडिया तो है नहीं जहाँ कागज़ी हरियाली की कमी न होती हो।

आखिर 2010 के मध्य में ज़ेड संचार नाम से हिन्दी ज़ेड नेट की अपनी वेबसाइट zsanchar.org के पते पर चालू की गई। इसे शुरु करने के कुछ समय बाद यह लगा कि जब वेबसाइट हिन्दी में है तो अंग्रेज़ी का अक्षर ज़ेड नाम में क्यों है? नतीजतन एक नये नाम की खोज की गई, जो ‘सह-संचार’ पर आकर रुकी।

आप अकेले नहीं होंगे अगर आप सोचते हैं कि यह नाम बड़ा नीरस है। अपना भी यही ख्याल है। नाम के साथ एक और समस्या है। ‘सह-संचार’ हिन्दी में सोशल नेटवर्किंग के समानार्थी के रुप में भी स्वीकृत होता लग रहा है। यह दूसरी समस्या शायद इतनी गंभीर नहीं है। जैसा कि भाषा विज्ञान में आम जानकारी है, एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। बल्कि उच्चारण और वर्तनी एक जैसे होने पर भी दो शब्द हो सकते हैं, जैसे दिन वाला ‘कल’ और पुर्जा वाला ‘कल’। इसलिए दूसरी समस्या का समाधान तो हमने यह मान लिया कि एक शब्द है ‘सह-संचार’ जिसका अर्थ है सोशल नेटवर्किंग और दूसरा शब्द (या नाम) है ‘सह-संचार’ जो ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स का हिन्दी संस्करण है।

पर नाम के नीरस होने की समस्या फिर भी बचती है। तो यह लेख उसी समस्या का स्पष्टीकरण देने के लिए लिखा गया माना जा सकता है। स्पष्टीकरण इस तरह कि नाम चाहे नीरस हो, पर उसकी कहानी नीरस नहीं है, बल्कि काफ़ी रोचक है।

वैसे हिन्दी संस्करण के नाम में ज़ेड (ज़ी) होने का भी एक वाजिब आधार है। और वहीं से हमारी कहानी शुरू होती है।

बीसवीं शताब्दी में कला का एक नया माध्यम सामने आया जिसे सिनेमा कहा जाता है। बहुत से शायद इस माध्यम की किसी भी कलात्मक संभावना से सिरे से ही इन्कार करते हों, पर उनसे बहस में भिड़ने का अभी अपना कोई इरादा नहीं है। तो इस नितांत नये माध्यम की सबसे बड़ी खासियत यह है इसकी पहुँच बहुत कम समय में बहुत बड़े जनसमूह तक एक ही समय पर हो सकती है और बहुत तेज़ी से फैल सकती है। इक्कीसवीं सदी और भी नये माध्यम लाती हुई दिख रही है, पर सिनेमा जितनी पहुँच तो अभी भी किसी अन्य माध्यम की नहीं है। टी वी की पहुँच कुछ मामलों में अधिक हो सकती है, पर उसकी कलात्मक संभावनाओं पर सवाल इस हद तक उठाए जा सकते हैं कि अधिकतर तो एकमात्र कला जो उस पर कभी-कभार नज़र आती है वो सिनेमा ही है। संगीत, नृत्य आदि भी पहले दिखते थे, पर वो ज़माना तो चला गया लगता है। इंटरनेट पर बाकायदा एक कलात्मक माध्यम के उभरने में शायद अभी कुछ समय लगेगा।

तो सिनेमा की इस असाधारण पहुँच के कारण ऐसे बहुत से लोग भी इसकी तरफ आकर्षित हुए जिनको प्रतिबद्ध कहा जाता है। हिन्दुस्तान के ही सर्वश्रेष्ठ सिनेकारों में से एक रितिक घटक, जिनका प्रगतिशील राजनीति और उससे जुड़े थियेटर से लंबे समय तक वास्ता रहा था, का कहना था कि उन्होंने सिर्फ़ इसलिए सिनेमा को अपनाया कि इसकी पहुँच बहुत बड़ी है और अगर हम अपनी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो सिनेमा को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। रितिक घटक जैसे अन्य कई सिनेकार विश्व सिनेमा में हुए हैं जिन्होंने इस माध्यम का प्रयोग न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति, बल्कि नैतिक-राजनैतिक कथन के लिए भी करने की कोशिश की है। उनकी राह में बाज़ारवाद, रूढ़िवाद तथा पूंजीवाद (भ्रष्टाचार को छोड़ भी दें तो) के चलते अनेक बाधाएँ आईं और वे किस हद तक सफल हुए यह कहना कठिन है, पर उनमें से कई काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्में बनाने में कामयाब हो सके, या कहना चाहिए कि उनकी फ़िल्में लोकप्रियता हासिल करने में कामयाब हो सकीं।

इन्हीं में से एक बहुत बड़ा नाम है कोस्ता गाव्रास। यूनानी (ग्रीक) मूल के गाव्रास का नाम लेते ही तस्वीर उभरती है ‘राजनैतिक’ फ़िल्मों की। यहाँ राजनैतिक से वैसा अर्थ नहीं है जैसा प्रकाश झा आदि की फ़िल्मों से जोड़ा जाता है, बल्कि वैसा है जैसा प्रतिबद्ध साहित्य के साथ जुड़ा है। यह अर्थभेद राजनीति तथा राजनीतिबाज़ी का है – पॉलिटिकल और पॉलिटिकिंग का।

ऐसी राजनैतिक फ़िल्मों में भी एक खास श्रेणी है उन फ़िल्मों की जो हमारे ही समय (यानी पिछली एक सदी के भीतर) की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फ़िल्मों की है। कोस्ता गाव्रास ने ऐसी ही फ़िल्में बनाने में अपनी महारत दिखाई है। ‘मिसिंग’, ‘स्टेट ऑफ़ सीज’, ‘एमेन.’ (पूर्ण विराम नाम में ही है) ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं। पर शायद उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म है ‘ज़ेड’ (या ‘ज़ी’)। यह आधारित है यूनान की ही राजनैतिक घटनाओं पर जब वहाँ अमरीकी दखलंदाज़ी की पृष्ठभूमि में फ़ासीवादियों द्वारा एक लोकप्रिय उदारवादी नेता की हत्या कर दी गई और उससे जो घटनाकृम शरू हुआ उसकी परिणति सेना द्वारा सत्ता पलट में हुई।

‘बैटल ऑफ़ अल्जियर्स’ तथा ‘ज़ेड’ वे दो फ़िल्में हैं जिन्हें इस श्रेणी की फ़िल्में बनाने वाला हर निर्देशक अपना काम शुरू करने से पहले देखना ज़रूरी समझता है।

कोस्ता गाव्रास के नाम के साथ यह कहानी भी जुड़ी है कि ‘ज़ेड’ की असाधारण (और शायद अप्रत्याशित) व्यावसायिक सफलता के बाद उन्हें (फ़्रांसिस फ़ोर्ड कपोला से पहले) गॉडफ़ादर निर्देशित करने का ‘ऑफ़र’ दिया गया था, पर उसे उन्होंने रिजेक्ट (या कहें ‘रिफ़्यूज़’) कर दिया क्योंकि उनके अनुसार स्क्रिप्ट माफ़िया का महिमामंडन करने वाली थी और वे उसमें कुछ बदलाव करना चाहते थे, जिसके लिए स्टूडियो वाले तैयार नहीं थे।

खैर, यह समय था विश्व युद्धों के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के पहले बड़े फैलाव का, यानी वियतनाम युद्ध का और ढेर सारी अन्य जगहों पर अमरीकी समर्थन प्राप्त सत्ता पलट और तानाशाही का। पर यह समय अमरीकी नागरिक अधिकार (सिविल राइट्स) आंदोलन का भी था। नोम चॉम्स्की और हावर्ड ज़िन जैसे लोग इस आंदोलन में सक्रिय थे, और जो छात्र इसमें शामिल थे उनमें एक थे माइकल ऐल्बर्ट,यानी ज़ेड नेट के संस्थापक।

जब मैंने पहली बार ज़ेड नेट पढ़ना शुरू किया था, उसके कुछ ही समय बाद मैंने यह अनुमान लगाया था कि हो न हो इसके नाम में यह अंग्रेज़ी का आखिरी अक्षर जो है, उसका कुछ संंबंध कोस्ता गाव्रास की फ़िल्म से है और यह बात मैंने अपने ब्लॉग पर भी लिखी थी। बाद में खुद ज़ेड नेट पर ही यह लिखा देखने को मिला कि यह अनुमान सही था।

बात इतनी अजीब नहीं है। दरअसल (आधुनिक) ग्रीक भाषा में इस अक्षर का अर्थ है ‘वह अभी जीवित है’ और उस फ़िल्म के अंत में यह अक्षर या शब्द इस अर्थ में एक लोकप्रिय नारा बन जाता है कि अमरीकी दखलंदाज़ी के विरोधी जिस जनप्रिय नेता की हत्या कर दी गई थी वो जन-मन में अब भी जीवित है, यानी जैसा कि ज़ेड नेट के मुख्य पृष्ठ पर लिखा है, प्रतिरोध की भावना अब भी जीवित है (द स्पिरिट ऑफ़ रेज़िस्टेंस लिव्स)।

सार यह कि ‘ज़ेड’ अंग्रेज़ी अक्षर नहीं हुआ, बल्कि एक राजनैतिक कथन हुआ। इसीलिए अगर हिन्दी संस्करण में भी यह रहता तो उसका वाजिब आधार था।

फिर यह ‘सह’ क्यों आया? मज़े की बात है कि यह भी ऐसा मामला है जहाँ एक ही उच्चारण और वर्तनी होने पर भी दो शब्द हैं – पहला तो सहने के अर्थ में और दूसरा सहयोग के अर्थ में। हमारे लिए दूसरा वाला मामला लागू होता है, हालांकि पहले को भी अक्सर झेलना पड़ सकता है।

लेकिन उससे भी मज़े की बात एक और है। वामपंथियों के खिलाफ़ एक आरोप जो अक्सर लगाया जाता है वह है कि जो व्यवस्था (या मनोहर श्याम जोशी के अनुकरण में कहें तो प्रतिष्ठान) अभी हमें जकड़े हुए है उसकी बुराइयाँ तो आप बहुत बताते रहते हैं, पर उसका कोई विकल्प आपके पास नहीं है। जो विकल्प माने जाते थे, यानी साम्यवादी व्यवस्था आदि, वे भी असफल साबित हो गए हैं। ये आरोप सच हैं या नहीं इस पर तो हम अभी नहीं जाएंगे, पर जिन माइकल ऐल्बर्ट का ज़िक्र हमने किया, यानी ज़ेड नेट के संस्थापक, वे एक विकल्प (पार्टिसिपेटरी इकोनॉमिक्स या पैरेकॉन) की परिकल्पना और विकास की कोशिश में अनवरत लगे हुए हैं, उसे हिन्दी में ‘भागीदारी की अर्थव्यवस्था’ या ‘सहयोग पर आधारित अर्थव्यवस्था’ कहा जा सकता है। तो सह-संचार के ‘सह’ को आप उससे जोड़ सकते हैं।

पर वो तो बाद की बात है। उससे पहले की बात यह है कि ‘स’ और ‘ह’ (संयुक्ताक्षरों को छोड़ दिया जाए तो) हिन्दी या देवनागरी, बल्कि ब्राह्मी, वर्णमाला के आखिरी ‘अक्षर’ हैं, जहाँ ‘अक्षर’ शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ी के ‘लेटर’ या ‘कैरेक्टर’ की तरह किया जा रहा है।

आपके बारे में नहीं मालूम, पर अपने को तो यह कहानी बड़ी रोचक लगती है। अगर ज़्यादा हो गया हो तो चलिए थोड़ी बहुत रोचक तो है ही। नहीं क्या? अगर नहीं तो कोस्ता गाव्रास की कुछ फ़िल्में ही देख डालिए। और देख ही रहे हों तो लगे हाथ रितिक घटक की फ़िल्मों पर भी हाथ साफ़ कर दीजिएगा।

(जो भी हो, यह याद रखा जाए कि सह-संचार अनिल एकलव्य की वेबसाइट नहीं है, चाहे अभी तक इसका ज़िम्मा लगभग पूरी तरह उन पर ही रहा हो। यह ज़ेड कम्यूनिकेशंस का हिन्दी संस्करण है। आप इस संचार में सहयोग करना चाहें तो एक बार फिर निमंत्रण है। संक्रामक रोग का कोई खतरा नहीं है।)

नर्क का ध्यान

(कविता: बर्तोल ब्रेख़्त)

नर्क का ध्यान करते हुए, जैसा कि एक बार मैंने सुना था,
मेरे भाई शेली ने उसे एक ऐसी जगह पाया था
जो काफ़ी कुछ लंदन जैसी ही है। मैं,
जो लंदन में नहीं रहता, बल्कि लॉस एंजेलेस में रहता हूँ,
पाता हूँ, नर्क का ध्यान करने पर, कि यह
और भी अधिक लॉस एंजेलेस जैसी ही होनी चाहिए।

और नर्क में ही,
मुझे कोई शक नहीं है, ऐसे शानदार बाग हैं
जहाँ फूल इतने बड़े होते हैं जितने पेड़, मुरझाते हुए,जाहिर है,
बहुत जल्दी, अगर उन्हें अत्यंत मँहगे पानी से न सींचा जाए। और फलों के बाज़ार
फलों के भारी ढेरों के साथ, जिनमें कि इस सबके बावजूद

न तो कोई महक होती है न ही स्वाद। और मोटरों की अंतहीन कड़ियाँ,
अपनी छायाओं से भी हल्की, और दौड़ते हुए
मूढ़ विचारों से भी अधिक तेज़, झिलमिलाते वाहन, जिनमें
गुलाबी लोग, न कहीं से आते हुए, न कहीं जाते हुए।
और मकान, खुशी के लिए प्रारूपित, खाली पड़े हुए,
तब भी जब बसे हुए।

नर्क के भी घर सब इतने तो बदसूरत नहीं होते।
पर सड़क पर फेंक दिए जाने की चिंता
आलीशान मकानों के निवासियों को भी
उतना ही सताती है जितना कि बैरकों के बाशिंदों को।

(अंग्रेज़ी से अनुवाद: अनिल एकलव्य)

एक जर्मन युद्ध पुस्तिका से

(कविता: बर्तोल ब्रेख़्त)

ऊँची जगहों पर आसीन लोगों में
भोजन के बारे में बात करना अभद्र समझा जाता है।
सच तो यह है: वो पहले ही
खा चुके हैं।

जो नीचे पड़े हैं, उन्हें इस धरती को छोड़ना होगा
बिना स्वाद चखे
किसी अच्छे माँस का।

यह सोचने-समझने के लिए कि वो कहाँ से आए हैं
और कहाँ जा रहे हैं
सुंदर शामें उन्हें पाती हैं
बहुत थका हुआ।

उन्होंने अब तक नहीं देखा
पर्वतों को और विशाल समुद्र को
और उनका समय अभी से पूरा भी हो चला।

अगर नीचे पड़े लोग नहीं सोचेंगे
कि नीचा क्या है
तो वे कभी उठ नहीं पाएंगे।

भूखे की रोटी तो सारी
पहले ही खाई जा चुकी है

माँस का अता-पता नहीं है। बेकार है
जनता का बहता पसीना।
कल्पवृक्ष का बाग भी
छाँट डाला गया है।
हथियारों के कारखानों की चिमनियों से
धुआँ उठता है।

घर को रंगने वाला बात करता है
आने वाले महान समय की

जंगल अब भी पनप रहे हैं।
खेत अब भी उपजा रहे हैं
शहर खड़े हैं अब भी।
लोग अब भी साँस ले रहे हैं।

पंचांग में अभी वो दिन नहीं
दिखाया गया है

हर महीना, हर दिन
अभी खुला पड़ा है। इन्हीं में से किसी दिन
पर एक निशान लग जाने वाला है।

मज़दूर रोटी के लिए पुकार लगा रहे हैं
व्यापारी बाज़ार के लिए पुकार लगा रहे हैं।
बेरोजगार भूखे थे। रोजगार वाले
अब भूखे हैं।
जो हाथ एक-दूसरे पर धरे थे अब फिर व्यस्त हैं।
वो तोप के गोले बना रहे हैं।

जो दस्तरख्वान से माँस ले सकते हैं
संतोष का पाठ पढ़ा रहे हैं।
जिनके भाग्य में अंशदान का लाभ लिखा है
वो बलिदान माँग रहे हैं।
जो भरपेट खा रहे हैं वही भूखों को बता रहे हैं
आने वाले अद्भुत समय की बात।
जो अपनी अगवानी में देश को खाई में ले जा रहे हैं
राज करने को बहुत मुश्किल बता रहे हैं
सामान्य लोगों के लिए।

जब नेता शान्ति की बात करते हैं
तो जनता समझ जाती है
कि युद्ध आ रहा है।
जब नेता युद्ध को कोसते हैं
लामबंदी का आदेश पहले ही लिखा जा चुका होता है।

जो शीर्ष पर बैठे हैं कहते हैं: शान्ति
और युद्ध
अलग पदार्थों से बने हैं।
पर उनकी शान्ति और उनके युद्ध
वैसे ही हैं जैसे आँधी और तूफ़ान।

युद्ध उनकी शान्ति से ही उपजता है
जैसे बेटा अपनी माँ से
उसकी शक्ल
अपनी माँ की डरावनी शक्ल से मिलती है।

उनका युद्ध मार देता है
हर उस चीज़ को जिसे उनकी शान्ति ने
छोड़ दिया था।

दीवार पर लिख दिया गया:
वो युद्ध चाहते हैं।
जिस आदमी ने यह लिखा
वो पहले ही गिर चुका है।

जो शीर्ष पर हैं कहते हैं:
वैभव और कीर्ति का रास्ता इधर है।
जो नीचे हैं कहते है:
कब्र का रास्ता इधर है।

जो युद्ध आ रहा है
वो पहला नहीं होगा। और भी थे
जो इसके पहले आए थे।
जब पिछला वाला खत्म हुआ
तब विजेता थे और विजित थे।
विजितों में आम लोग भी थे
भुखमरे। विजेताओं में भी
आम लोग भुखमरी का शिकार हुए।

जो शीर्ष पर हैं कहते हैं साहचर्य
व्याप्त है सेना में।
इस बात का सच देखा जा सकता है
रसोई के भीतर।
उनके दिलों में होना चाहिए
वही एक शौर्य। लेकिन
उनकी थालियों में
दो तरह के राशन हैं।

जहाँ तक कूच करने की बात है उनमें से कई
नहींं जानते

कि उनका शत्रु तो उनके सिर पर ही चल रहा है।
जो आवाज़ उनको आदेश दे रही है
उनके शत्रु की आवाज़ है और
जो आदमी शत्रु की बात कर रहा है
वो खुद ही शत्रु है।

यह रात का वक़्त है
विवाहित जोड़े
अपने बिस्तरों में हैं। जवान औरतें
अनाथों को जन्म देंगी।

सेनाधीश, तुम्हारा टैंक एक शक्तिशाली वाहन है
यह जंगलों को कुचल देता है और सैकड़ों लोगों को भी।
पर उसमें एक खोट है:
उसे एक चालक की ज़रूरत होती है।

सेनाधीश, तुम्हारा बमवर्षी बहुत ताकतवर है,
यह तूफ़ान से भी तेज़ उड़ता है और एक हाथी से ज़्यादा वज़न ले जा सकता है।
पर उसमें एक खोट है:
उसे एक मेकैनिक की ज़रूरत होती है।

सेनाधीश, आदमी बड़े काम की चीज़ है।
वो उड़ सकता है और मार सकता है।
पर उसमें एक खोट है:
वो सोच सकता है।

अंग्रेज़ी से अनुवाद: अनिल एकलव्य

ओ जर्मनी, म्लान माँ!

(कविता: बर्तोल ब्रेख़्त)

औरों को बोलने दो उसकी शर्म के बारे में,
मैं तो अपनी शर्म के बारे में बोलता हूँ।

ओ जर्मनी, म्लान माँ!
तुम कितनी मैली हो
अब जबकि तुम बैठी हो
और इतरा रही हो
कीचड़ सनी भीड़ में।

तुम्हारा सबसे गरीब पुत्र
बेजान होकर गिर पड़ा।
जब भूख उसकी बर्दाश्त से बाहर हो गई।
तुम्हारे अन्य पुत्रों ने
अपने हाथ उसके खिलाफ़ उठा दिए।
यह तो कुख्यात है।

अपने हाथ इस तरह उठा कर,
अपने ही भाई के विरुद्ध,
वो तुम्हारे चारों तरफ़ घूमते हैं
और तुम्हारे मुँह पर हँसते हैं।
यह भी सर्वज्ञात है।

तुम्हारे घर में
दहाड़ कर झूठ बोले जाते हैं
लेकिन सच को
चुप रहना होगा
क्या ऐसा ही है?

क्यों उत्पीड़क तुम्हारी प्रशंसा करते हैं दुनिया भर में,
क्यों उत्पीड़ित निंदा करते हैं?
जिन्हें लूटा गया
तुम्हारी तरफ़ उंगली उठाते हैं, लेकिन
लुटेरा उस व्यवस्था की तारीफ़ करता है
जिसका अविष्कार हुआ तुम्हारे घर में!

जिसके चलते हर कोई तुम्हें देखता है
अपनी ओढ़नी का किनारा छुपाते हुए, जो कि खून से सना है
उसी खून से जो
तुम्हारे ही पुत्रों का है।

तुम्हारे घर से उग्र भाषणों की प्रतिध्वनि को सुन कर,
लोग हँसते हैं।
पर जो भी तुम्हें देखता, अपनी छुरी पर हाथ बढ़ाता है
जैसे कोई डाकू देख लिया हो।

ओ जर्मनी, म्लान माँ!
क्या तुम्हारे पुत्रों ने तुम्हें मजबूर कर दिया है
कि तुम लोगों के बीच बैठो
तिरस्कार और भय की वस्तु बन कर!

अंग्रेज़ी से अनुवाद: अनिल एकलव्य

कवि परीक्षा

एक बार जब हमने कुछ कविताएँ लिख डाली थीं तो हुआ ये कि एक दिन हमें उनमें से कुछ को दुबारा पढ़ते हुए लगा कि हिन्दी की तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं और बहुत सी किताबों में भी जो कविताएँ छपा करती हैं उनसे ये कुछ बुरी तो नहीं हैं। बल्कि हमें ईमानदारी से लगा कि उनमें से अधिकतर से तो अच्छी ही हैं। तो साहब हमने सोचा कि इन्हें खुद ही पढ़-पढ़ कर कैसे चलेगा, क्यों ना इन्हें छपवाने की कोशिश की जाए। फिर क्या था, हमने उनकी एक-एक कॉपी निकाल कर एक फ़ाइल में सजाया जैसे नौकरी का उम्मीदवार अपनी डिग्रियाँ, मार्कशीट और प्रमाणपत्र सजाता है। इस फ़ाइल को एक अच्छे से बैग में, जो मुफ़्त में कहीं से कभी मिला था, रख कर पहुँच गए एक प्रकाशक के दफ़्तर।

दफ़्तर कोई शानदार नहीं था, लेकिन हिन्दी, वो भी साहित्य, का प्रकाशन दफ़्तर होने के लिहाज से बुरा भी नहीं था। लगता था यहाँ कुछ पाठ्यपुस्तकें या कॉफ़ी टेबल टाइप की किताबें भी छपती होंगी। हो सकता है धार्मिक पुस्तकें भी छपती हों। लगा शायद कविता छपने का कुछ मानदेय भी मिल सकता है। और तो और, एक रिसेप्शनिस्ट भी थी। उसी ने दफ़्तर की हिन्दी-सापेक्ष शान से ध्यान हटा कर पूछा कि क्या चाहिए। गलत मत समझिए, पूछा ऐसे शब्दों में ही था जैसे शब्दों में कोई रिसेप्शनिस्ट पूछती है, पर हमें ऐसे शब्द ठीक से याद नहीं रह पाते।

उद्देश्य बताने पर उसने एक फ़ॉर्म जैसा पकड़ा दिया। पूछा तो बताया कि ये कुछ सवालों की लिस्ट है जिनके जवाब देने के बाद ही संपादक से मिल कर कविता के बारे में बात हो सकती है। सवाल कुछ ऐसे ही थे जैसे किसी झटपट परीक्षा में पूछे जाते हैँ। अब हमने इतनी और ऐसी-ऐसी परीक्षाएँ दी हैं कि कुछ सोचे बिना ही सवाल मुँह से निकल पड़ा कि इस परीक्षा में पास मार्क्स कितने हैं। रिसेप्शनिस्ट ने नाराज़ सा होकर कहा कि पास मार्क्स क्या मतलब, यह साहित्य प्रकाशन का दफ़्तर है। फिर बोली कि वैसे कम से कम तैंतीस प्रतिशत सवालों के जवाब सही होने पर ही कविता छापने की संभावना पर गौर किया जाएगा। जब हमने पूछा कि ये क्या कोई नया इंतज़ाम है, तो बोली कि नहीं ऐसा तो न जाने कब से हो रहा है। कमाल की बात है, हम अपने-आप को साहित्य का बड़ा तगड़ा जानकार समझते थे और हमें ये बात पता ही नहीं थी।

उन सवालों में से जितने याद पड़ते हैं, उन्हें नीचे दिया जाता है। भाषा के बारे में जो ऊपर कहा गया उसे ध्यान में रखा जाए। सवालों का क्रम बिगड़ा हुआ हो सकता है।

  1. आप कला से हैं या विज्ञान से?
  2. आप कोई मंत्री, अफ़सर या कम-से-कम प्रोफ़ेसर हैं?
  3. आपकी कविताओं में से कितनी प्रकृति-प्रेम की कविताएँ है?
  4. आपकी कविताओं में से कितनी प्रेम कविताएँ है?
  5. आपकी कविता से कभी कोई लड़की पटी है?
  6. आपकी कविता पढ़ कर कभी किसी हसीना ने आपको ख़ुतूत लिखे हैं?
  7. माफ़ करें, लेकिन क्या आप खुद हसीना हैं?
  8. आपने कभी याराने-दोस्ताने पर कोई कविता लिखी है?
  9. आपके दोस्तों की संख्या कितनी है?
  10. क्या आपकी कोई प्रेमिका है?
  11. क्या आप शादी-शुदा हैं?
  12. क्या आप अपनी घरवाली से प्रेम करते हैं?
  13. आपकी कविताओं में से कितनी वीर रस की कविताएँ हैं?
  14. आपकी कविताओं को कोई गाता-वाता है?
  15. आपकी कविताओं में से कितनी गाने लायक हैं?
  16. आपके कवि-गुरू कौन थे?
  17. क्या आपने उनकी जितना हो सका सेवा की?
  18. आप कवियों की संगत में रहे हैं?
  19. क्या आपने काफ़ी समय कॉफ़ी हाउस में बहस करते हुए गुज़ारा है?
  20. आप किसी कवि से सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  21. आप किसी भी बड़े आदमी से सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  22. आप किसी से भी सिफ़ारिश पत्र ला सकते हैं?
  23. आपने जो कविताएँ अभी लिखी हैं, उन्हें ब्लॉग वगैरह पर तो नहीं डाल रखा?
  24. आप ब्लॉग लेखक तो नहीं हैं?
  25. आपने कोई महाकाव्य लिखा है?
  26. आपने कोई खंडकाव्य लिखा है?
  27. आपने कोई लंबी कविता लिखी है?
  28. आपने किसी कवि-सम्मेलन या मुशायरे में कविता पढ़ी है?
  29. आपकी कविता कभी किसी फ़िल्म में शामिल हुई है?
  30. आपकी कविता कभी किसी नाटक में शामिल हुई है?
  31. आपको कविता लिखने के लिए कभी कोई फेलोशिप आदि मिली है?
  32. आप हिन्दी साहित्य के किसी गुट के सधे हुए सदस्य हैं?
  33. अगर हम आपकी कविताओं का संग्रह छाप दें तो क्या आप उसकी एक हज़ार या अधिक प्रतियाँ खरीदने के लिए तैयार हैं?
  34. क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि आप अपने कविता संग्रह को कहीं पाठ्यपुस्तक बनवा सकें?
  35. क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि आप हमारे अन्य प्रकाशनों को विज्ञापन दिलवा सकें?
  36. क्या आप खुद हमारे अन्य प्रकाशनों को विज्ञापन दिलवा सकते हैं?
  37. क्या आप धार्मिक कविताएँ लिखते हैं?
  38. क्या आप राष्ट्रवादी कविताएँ लिखते हैं?
  39. क्या आपकी कविताओं की राजनीति पाठकों के किसी खास समूह को एक साथ आकर्षित कर सकती है?
  40. क्या आपकी कविताएँ किसी प्रतिष्ठित परंपरा की हैं?
  41. क्या आप कविता की किसी नई परंपरा के प्रवर्तन का दावा करते हैं?
  42. क्या आप समझते हैं कि आपके जैसी कविताएँ आजकल फ़ैशन में हैं?
  43. क्या आपकी कविताएँ पहले कहीं छपी हैं?
  44. आपके ही नाम वाला कोई कवि पहले से तो मौजूद नहीं है?
  45. आप पहले से दूसरों की कविताओं के अनुवादक तो नहीं हैं?

इतना तो हमें मालूम है कि नौकरी के उम्मीदवार को, खास तौर से अगर वो नया हो, अक्सर कहाँ पता होता है कि उसकी डिग्रियाँ, मार्कशीट और प्रमाणपत्र किसी खास काम के नहीं हैं। उनकी ज़रूरत सिर्फ़ उम्मीदवारों (कैसा बढ़िया शब्द है!) की भीड़ का आकार नियंत्रण में रखने के लिए होती है। पर यहाँ तो पता चला कि मामले का प्रमाणपत्र तक पहुँचना ही दूर की बात है।

अपन तो चुपके से भाग आए वहाँ से। बेस्ती हो जाती। आज तक कभी डबल ज़ीरो नहीं आया।

पनहद

मैंने सोचा था
कमीनेपन की
कोई तो हद
होती होगी

इसका उल्टा जानने की
मेरी कोई इच्छा नहीं थी

पर कोई मेरे घर
आकर और खाकर
ज़बरदस्ती बता गया
कि नहीं होती
एकदम नहीं होती

भाव खाना

कुछ लोगों को भवसागर में आने से लेकर
भवसागर पार हो जाने तक लगातार
बहुत चाव से भाव खिलाया जाता है
यहाँ तक कि कभी-कभी तो उनको
भाव ही बहुत सस्ता लगने लगता है

कुछ और लोग होते हैं जो आने के बाद
कभी, कहीं, किसी तरह दूसरे लोगों से
भाव खाने का हक हासिल कर लेते हैं

ऐसे लोगों की तो गिनती ही नहीं है जो
बावर्दी या मुफ़्ती, तलवार से या मीठी छुरी से
बहुतों से बहुत सा भाव छीनने के एवज में
अपने लिए भी और अपनों के लिए भी
अपने और अपनों के सपनों के लिए भी
जितना हो सके भाव का इनाम पा लेते हैं

ऐसे भी होते हैं जिन्हें घूमते-घामते ही
हालात का चक्का बिना किसी कारण
औरों से भाव खाने का परमिट दे जाता है

बाकी रहे वो जिन्हें काव-काव करके
अपनी ज़बान तमाम जला डालने
या मुँह ही सिलने-सिलवा-लेने पर भी
कोई रत्ती भर भाव देने को राज़ी नहीं होता

उन्हें तहज़ीब को ऊपर ताक पर रख कर
पालथी मार कर और हाथ धो-धाकर
जो भी जितना भी जैसा भी और जब भी जुटे
रोकर हँस कर या बुद्धं शरणं सा भाव धर कर
खुद ही खुद को भाव खिलाना पड़ता है