नीरस नाम की रोचक कहानी

7 जनवरी, 2011

(मूल लेख)

ज़ेड नेट या ज़ी नेट, आप अंग्रेज़ी वर्णमाला के आखिरी अक्षर को जिस भी तरह उच्चारित करते हों (जो इस पर निर्भर करता है कि आप पिछले साम्राज्य के प्रभाव में पले हैं या नये वाले के), का हिन्दी संस्करण शुरू किए अब चार साल से ऊपर हो गए हैं। एकदम ठीक तारीख दी जाए तो 1 दिसंबर, 2006 को हिन्दी ज़ेड नेट की वेबसाइट शुरू हुई थी। तब से काफ़ी कुछ बदल गया है। ज़ेड नेट खुद अब ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स बन गया है, जिसका एक प्रमुख भाग फिर भी ज़ेड नेट है।

हिन्दी संस्करण की शुरुआत इस तरह हुई थी कि अपन ज़ेड नेट अक्सर पढ़ते रहते थे और एक दिन अपन ने देखा कि इसके कुछ अन्य भाषाओं में भी संस्करण हैं। पाठकों-उपयोक्ताओं के लिए लिखा गया एक निमंत्रण सा भी दिखा कि अगर आप इनमें से किसी में सहयोग देने या एक नई भाषा के संस्करण की शुरुआत करने में रुचि रखते हैं तो संपर्क करें। अपने को लगा कि भाई हिन्दी में भी इसका एक संस्करण होना ही चाहिए, तो अपन ने माइकल स्पैनोस, जिनका नाम संपर्क के लिए दिया था, उन्हें एक मेल लिख डाली। जवाब आया और ज़ेड नेट के लेखों का अनुवाद करके हिन्दी संस्करण की वेबसाइट बनाने का काम शुरू हो गया। पाँच लेखों के अनुवाद से शुरुआत हुई, जो नोम चॉम्स्की, माइकल ऐल्बर्ट, अरुंधति रॉय, जॉर्ज मॉनबिऑट तथा तारिक़ अली के लिखे हुए थे। उस समय वेबसाइट ज़ेड नेट के ही सर्वर पर बनाई गई थी, क्योंकि हिन्दी ज़ेड नेट के लिए अलग से कोई इंतज़ाम नहीं था।

बाद में कुछ अन्य लेखों के भी अनुवाद किए, मगर और कामों से समय निकाल कर उतना नहीं हो पाया जितना सोचा था। फिर भी धीरे-धीरे चलता रहा। उम्मीद यह थी कि अन्य लोग भी अनुवाद में सहयोग देने के लिए मिलेंगे, पर एकाध लेख के अलावा कोई और अनुवाद करने वाला नहीं मिला, लिहाजा एक व्यक्ति से जो हो सका वही होता रहा। एक समस्या यह भी थी कि हिन्दी की अपनी वेबसाइट न होने के कारण कुछ भी करने (चाहे टाइपिंग की कोई गलती सुधारने जैसी ज़रा सी बात ही हो) में भी काफ़ी समय लग जाता था क्योंकि ज़ेड नेट की वेबसाइट भी जिन लोगों के सहारे चल रही है, उनके पास भी पहले से ही बहुत से काम हैं और वे अन्य गतिविधियों में भी अपना समय देते हैं। और यह कोई व्यावसायिक मीडिया तो है नहीं जहाँ कागज़ी हरियाली की कमी न होती हो।

आखिर 2010 के मध्य में ज़ेड संचार नाम से हिन्दी ज़ेड नेट की अपनी वेबसाइट zsanchar.org के पते पर चालू की गई। इसे शुरु करने के कुछ समय बाद यह लगा कि जब वेबसाइट हिन्दी में है तो अंग्रेज़ी का अक्षर ज़ेड नाम में क्यों है? नतीजतन एक नये नाम की खोज की गई, जो ‘सह-संचार’ पर आकर रुकी।

आप अकेले नहीं होंगे अगर आप सोचते हैं कि यह नाम बड़ा नीरस है। अपना भी यही ख्याल है। नाम के साथ एक और समस्या है। ‘सह-संचार’ हिन्दी में सोशल नेटवर्किंग के समानार्थी के रुप में भी स्वीकृत होता लग रहा है। यह दूसरी समस्या शायद इतनी गंभीर नहीं है। जैसा कि भाषा विज्ञान में आम जानकारी है, एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। बल्कि उच्चारण और वर्तनी एक जैसे होने पर भी दो शब्द हो सकते हैं, जैसे दिन वाला ‘कल’ और पुर्जा वाला ‘कल’। इसलिए दूसरी समस्या का समाधान तो हमने यह मान लिया कि एक शब्द है ‘सह-संचार’ जिसका अर्थ है सोशल नेटवर्किंग और दूसरा शब्द (या नाम) है ‘सह-संचार’ जो ज़ेड (ज़ी) कम्यूनिकेशन्स का हिन्दी संस्करण है।

पर नाम के नीरस होने की समस्या फिर भी बचती है। तो यह लेख उसी समस्या का स्पष्टीकरण देने के लिए लिखा गया माना जा सकता है। स्पष्टीकरण इस तरह कि नाम चाहे नीरस हो, पर उसकी कहानी नीरस नहीं है, बल्कि काफ़ी रोचक है।

वैसे हिन्दी संस्करण के नाम में ज़ेड (ज़ी) होने का भी एक वाजिब आधार है। और वहीं से हमारी कहानी शुरू होती है।

बीसवीं शताब्दी में कला का एक नया माध्यम सामने आया जिसे सिनेमा कहा जाता है। बहुत से शायद इस माध्यम की किसी भी कलात्मक संभावना से सिरे से ही इन्कार करते हों, पर उनसे बहस में भिड़ने का अभी अपना कोई इरादा नहीं है। तो इस नितांत नये माध्यम की सबसे बड़ी खासियत यह है इसकी पहुँच बहुत कम समय में बहुत बड़े जनसमूह तक एक ही समय पर हो सकती है और बहुत तेज़ी से फैल सकती है। इक्कीसवीं सदी और भी नये माध्यम लाती हुई दिख रही है, पर सिनेमा जितनी पहुँच तो अभी भी किसी अन्य माध्यम की नहीं है। टी वी की पहुँच कुछ मामलों में अधिक हो सकती है, पर उसकी कलात्मक संभावनाओं पर सवाल इस हद तक उठाए जा सकते हैं कि अधिकतर तो एकमात्र कला जो उस पर कभी-कभार नज़र आती है वो सिनेमा ही है। संगीत, नृत्य आदि भी पहले दिखते थे, पर वो ज़माना तो चला गया लगता है। इंटरनेट पर बाकायदा एक कलात्मक माध्यम के उभरने में शायद अभी कुछ समय लगेगा।

तो सिनेमा की इस असाधारण पहुँच के कारण ऐसे बहुत से लोग भी इसकी तरफ आकर्षित हुए जिनको प्रतिबद्ध कहा जाता है। हिन्दुस्तान के ही सर्वश्रेष्ठ सिनेकारों में से एक रितिक घटक, जिनका प्रगतिशील राजनीति और उससे जुड़े थियेटर से लंबे समय तक वास्ता रहा था, का कहना था कि उन्होंने सिर्फ़ इसलिए सिनेमा को अपनाया कि इसकी पहुँच बहुत बड़ी है और अगर हम अपनी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो सिनेमा को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। रितिक घटक जैसे अन्य कई सिनेकार विश्व सिनेमा में हुए हैं जिन्होंने इस माध्यम का प्रयोग न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति, बल्कि नैतिक-राजनैतिक कथन के लिए भी करने की कोशिश की है। उनकी राह में बाज़ारवाद, रूढ़िवाद तथा पूंजीवाद (भ्रष्टाचार को छोड़ भी दें तो) के चलते अनेक बाधाएँ आईं और वे किस हद तक सफल हुए यह कहना कठिन है, पर उनमें से कई काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्में बनाने में कामयाब हो सके, या कहना चाहिए कि उनकी फ़िल्में लोकप्रियता हासिल करने में कामयाब हो सकीं।

इन्हीं में से एक बहुत बड़ा नाम है कोस्ता गाव्रास। यूनानी (ग्रीक) मूल के गाव्रास का नाम लेते ही तस्वीर उभरती है ‘राजनैतिक’ फ़िल्मों की। यहाँ राजनैतिक से वैसा अर्थ नहीं है जैसा प्रकाश झा आदि की फ़िल्मों से जोड़ा जाता है, बल्कि वैसा है जैसा प्रतिबद्ध साहित्य के साथ जुड़ा है। यह अर्थभेद राजनीति तथा राजनीतिबाज़ी का है – पॉलिटिकल और पॉलिटिकिंग का।

ऐसी राजनैतिक फ़िल्मों में भी एक खास श्रेणी है उन फ़िल्मों की जो हमारे ही समय (यानी पिछली एक सदी के भीतर) की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फ़िल्मों की है। कोस्ता गाव्रास ने ऐसी ही फ़िल्में बनाने में अपनी महारत दिखाई है। ‘मिसिंग’, ‘स्टेट ऑफ़ सीज’, ‘एमेन.’ (पूर्ण विराम नाम में ही है) ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं। पर शायद उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्म है ‘ज़ेड’ (या ‘ज़ी’)। यह आधारित है यूनान की ही राजनैतिक घटनाओं पर जब वहाँ अमरीकी दखलंदाज़ी की पृष्ठभूमि में फ़ासीवादियों द्वारा एक लोकप्रिय उदारवादी नेता की हत्या कर दी गई और उससे जो घटनाकृम शरू हुआ उसकी परिणति सेना द्वारा सत्ता पलट में हुई।

‘बैटल ऑफ़ अल्जियर्स’ तथा ‘ज़ेड’ वे दो फ़िल्में हैं जिन्हें इस श्रेणी की फ़िल्में बनाने वाला हर निर्देशक अपना काम शुरू करने से पहले देखना ज़रूरी समझता है।

कोस्ता गाव्रास के नाम के साथ यह कहानी भी जुड़ी है कि ‘ज़ेड’ की असाधारण (और शायद अप्रत्याशित) व्यावसायिक सफलता के बाद उन्हें (फ़्रांसिस फ़ोर्ड कपोला से पहले) गॉडफ़ादर निर्देशित करने का ‘ऑफ़र’ दिया गया था, पर उसे उन्होंने रिजेक्ट (या कहें ‘रिफ़्यूज़’) कर दिया क्योंकि उनके अनुसार स्क्रिप्ट माफ़िया का महिमामंडन करने वाली थी और वे उसमें कुछ बदलाव करना चाहते थे, जिसके लिए स्टूडियो वाले तैयार नहीं थे।

खैर, यह समय था विश्व युद्धों के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के पहले बड़े फैलाव का, यानी वियतनाम युद्ध का और ढेर सारी अन्य जगहों पर अमरीकी समर्थन प्राप्त सत्ता पलट और तानाशाही का। पर यह समय अमरीकी नागरिक अधिकार (सिविल राइट्स) आंदोलन का भी था। नोम चॉम्स्की और हावर्ड ज़िन जैसे लोग इस आंदोलन में सक्रिय थे, और जो छात्र इसमें शामिल थे उनमें एक थे माइकल ऐल्बर्ट,यानी ज़ेड नेट के संस्थापक।

जब मैंने पहली बार ज़ेड नेट पढ़ना शुरू किया था, उसके कुछ ही समय बाद मैंने यह अनुमान लगाया था कि हो न हो इसके नाम में यह अंग्रेज़ी का आखिरी अक्षर जो है, उसका कुछ संंबंध कोस्ता गाव्रास की फ़िल्म से है और यह बात मैंने अपने ब्लॉग पर भी लिखी थी। बाद में खुद ज़ेड नेट पर ही यह लिखा देखने को मिला कि यह अनुमान सही था।

बात इतनी अजीब नहीं है। दरअसल (आधुनिक) ग्रीक भाषा में इस अक्षर का अर्थ है ‘वह अभी जीवित है’ और उस फ़िल्म के अंत में यह अक्षर या शब्द इस अर्थ में एक लोकप्रिय नारा बन जाता है कि अमरीकी दखलंदाज़ी के विरोधी जिस जनप्रिय नेता की हत्या कर दी गई थी वो जन-मन में अब भी जीवित है, यानी जैसा कि ज़ेड नेट के मुख्य पृष्ठ पर लिखा है, प्रतिरोध की भावना अब भी जीवित है (द स्पिरिट ऑफ़ रेज़िस्टेंस लिव्स)।

सार यह कि ‘ज़ेड’ अंग्रेज़ी अक्षर नहीं हुआ, बल्कि एक राजनैतिक कथन हुआ। इसीलिए अगर हिन्दी संस्करण में भी यह रहता तो उसका वाजिब आधार था।

फिर यह ‘सह’ क्यों आया? मज़े की बात है कि यह भी ऐसा मामला है जहाँ एक ही उच्चारण और वर्तनी होने पर भी दो शब्द हैं – पहला तो सहने के अर्थ में और दूसरा सहयोग के अर्थ में। हमारे लिए दूसरा वाला मामला लागू होता है, हालांकि पहले को भी अक्सर झेलना पड़ सकता है।

लेकिन उससे भी मज़े की बात एक और है। वामपंथियों के खिलाफ़ एक आरोप जो अक्सर लगाया जाता है वह है कि जो व्यवस्था (या मनोहर श्याम जोशी के अनुकरण में कहें तो प्रतिष्ठान) अभी हमें जकड़े हुए है उसकी बुराइयाँ तो आप बहुत बताते रहते हैं, पर उसका कोई विकल्प आपके पास नहीं है। जो विकल्प माने जाते थे, यानी साम्यवादी व्यवस्था आदि, वे भी असफल साबित हो गए हैं। ये आरोप सच हैं या नहीं इस पर तो हम अभी नहीं जाएंगे, पर जिन माइकल ऐल्बर्ट का ज़िक्र हमने किया, यानी ज़ेड नेट के संस्थापक, वे एक विकल्प (पार्टिसिपेटरी इकोनॉमिक्स या पैरेकॉन) की परिकल्पना और विकास की कोशिश में अनवरत लगे हुए हैं, उसे हिन्दी में ‘भागीदारी की अर्थव्यवस्था’ या ‘सहयोग पर आधारित अर्थव्यवस्था’ कहा जा सकता है। तो सह-संचार के ‘सह’ को आप उससे जोड़ सकते हैं।

पर वो तो बाद की बात है। उससे पहले की बात यह है कि ‘स’ और ‘ह’ (संयुक्ताक्षरों को छोड़ दिया जाए तो) हिन्दी या देवनागरी, बल्कि ब्राह्मी, वर्णमाला के आखिरी ‘अक्षर’ हैं, जहाँ ‘अक्षर’ शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ी के ‘लेटर’ या ‘कैरेक्टर’ की तरह किया जा रहा है।

आपके बारे में नहीं मालूम, पर अपने को तो यह कहानी बड़ी रोचक लगती है। अगर ज़्यादा हो गया हो तो चलिए थोड़ी बहुत रोचक तो है ही। नहीं क्या? अगर नहीं तो कोस्ता गाव्रास की कुछ फ़िल्में ही देख डालिए। और देख ही रहे हों तो लगे हाथ रितिक घटक की फ़िल्मों पर भी हाथ साफ़ कर दीजिएगा।

(जो भी हो, यह याद रखा जाए कि सह-संचार अनिल एकलव्य की वेबसाइट नहीं है, चाहे अभी तक इसका ज़िम्मा लगभग पूरी तरह उन पर ही रहा हो। यह ज़ेड कम्यूनिकेशंस का हिन्दी संस्करण है। आप इस संचार में सहयोग करना चाहें तो एक बार फिर निमंत्रण है। संक्रामक रोग का कोई खतरा नहीं है।)

Howard Zinn

Another man done gone. But just the body. The Howard Zinn I knew (even if only slightly and not personally) and lot of others knew, is not going to die so easily, in spite of the manufactured consent and the manufactured dissent (of the Caine and Melnyk kind, not the Michael Moore kind).

I am not mad about meeting people, even great ones, but I wish I could have met him and told him that I have translated one of his articles in Hindi.

Still, I might translate more.

In case you don’t know anything about him, his is the book to find out about the American (US) History: A People’s History of the United States. But he didn’t just write. He participated in as many movements for justice as he could and faced beatings and arrests. He could do that because he didn’t have to juggle for maintaining a privileged place in the establishment and also a place as an acceptable honorable dissenter. Some of you might be disappointed now if I mention that he served as a bombardier in World War II and was no loony hippie.

Here is one of his recent interviews and below is another:

(It seems to have suddenly become unavailable here, though all other videos are working. You can still read the transcript here)

And you might also be able to watch, or rather listen to (unless that too suddenly becomes unavailable) readings from parts of The People’s History of the United States by Matt Damon. I am adding the first part below, from which you can navigate to the other parts:

अगर इतिहास को रचनात्मक होना है

(लेख – हावर्ड ज़िन – 09 दिसंबर, 2006)

यह निबंध हावर्ड ज़िन की सिटी लाइट्स द्वारा प्रकाशित नई किताब “वह ताकत जिसे सरकार नहीं दबा सकती” का पहला अध्याय है

अमेरिका का भविष्य इससे जुड़ा है कि हम अपना अतीत किस तरह समझते हैं। इसी कारण मेरे लिए इतिहास लिखना कभी एक तटस्थ कर्म नहीं रहता। लिख कर मैं नस्लवादी अन्याय, लैंगिक पक्षपात, वर्गों की ग़ैर-बराबरी, तथा राष्ट्रीय दर्प के बारे में व्यापक जागरूकता लाने की उम्मीद करता हूँ। मैं जनता द्वारा प्रतिष्ठान के विरुद्ध दर्ज न किए गए प्रतिरोध को भी सामने लाना चाहता हूँ: आदिवासियों का एकदम गायब हो जाने से मना करना; गुलामी के विरुद्ध आंदोलन में तथा हाल के रंगभेदी अलगाव के विरुद्ध आंदोलन में अश्वेत लोगों का विद्रोह; कामगारों के द्वारा अपना जीवन सुधारने के लिए अमरीका के पूरे इतिहास में की गई हड़तालें।

प्रतिरोध की इन कार्यवाहियों को नज़रअंदाज़ करने का मतलब है इस शासकीय मत का समर्थन करना कि ताकत केवल उन्हीं के पास हो सकती है जिनके पास बंदूकें हैं तथा जिनका धन-संपत्ति पर कब्ज़ा है। मैं इसलिए लिखता हूँ कि एक बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष कर रहे लोगों की रचनात्मक शक्ति को रोशनी में ला सकूँ। लोगों के पास, यदि संगठित हों तो, ज़बरदस्त ताकत होती है, किसी भी सरकार से ज़्यादा। हमारा इतिहास उन लोगों की कहानियों से भरा पड़ा है जो विरोध में खड़े होते हैं, हिम्मत करके बोलते हैं, अड़ जाते हैं, संगठन बनाते हैं, जुड़ते हैं, प्रतिरोध के जाल बनाते हैं, और इतिहास की धारा को बदल देते हैं।

मैं जन आंदोलनों की काल्पनिक जीतों की खोज नहीं करना चाहता। लेकिन यह सोचना कि इतिहास लेखन को केवल अतीत पर छाई हुई असफलताओं को याद दिलाना चाहिए, इतिहासकारों को हार के अंतहीन चक्र में शामिल कर लेने जैसा है। अगर इतिहास को रचनात्मक होना है, अतीत को नकारे बिना संभावित भविष्य के लिए तैयार होना है, तो मेरा मानना है कि उसे नई संभावनाओं पर ज़ोर देना चाहिए, अतीत की उन छिपी हुई घटनाओं को सामने लाकर, चाहे छोटी-छोटी झलकों में ही, जब लोगों ने अपनी प्रतिरोध की, साथ जुड़ने की, और कभी-कभी जीतने की भी क्षमताएँ प्रदर्शित की हैं। मैं मान रहा हूँ, या शायद उम्मीद कर रहा हूँ, कि हमारा भविष्य हमें अतीत के सहृदय शरणार्थी लम्हों में मिलेगा, न कि उसकी युद्घों से भरी ठोस सदियों में।

इतिहास हमारे संघर्ष में मदद कर सकता है, निर्णायक रूप से नहीं भी तो कम से कम रास्ता सुझाने के लिए। इतिहास हमें इस विचार से छुटकारा दिला सकता है कि सरकार के हित और जनता के हित एक ही होते हैं। इतिहास हमें बता सकता है कि सरकारें हम से किस तरह झूठ बोलती रही हैं, किस तरह पूरी आबादियों के नरसंहार का आदेश देती रही हैं, किस तरह वे गरीबों के अस्तित्व को ही नकार देती हैं, किस तरह वे हमें हमारे वर्तमान ऐतिहासिक क्षण तक ले आई हैं – “लंबा युद्ध,” बिना अंत का युद्ध।

यह सच है कि हमारी सरकार के पास देश का धन जैसे चाहे खर्च करने की ताकत है। वह दुनिया में कहीं भी फौजें भेज सकती है। वह उन दो करोड़ आप्रवासियों की गिरफ़्तारी और निष्कासन का आदेश दे सकती है जिनके पास ग्रीन कार्ड नहीं है और जिन्हें कोई संवैधानिक अधिकार भी नहीं मिले हुए हैं। हमारे “राष्ट्रीय हितों” के नाम पर सरकार सैनिकों को अमरीका-मैक्सिको सीमा पर तैनात कर सकती है, कुछ देशों से मुस्लिमों को पकड़ कर ला सकती है, खुफ़िया तौर पर हमारी बातें सुन सकती है, हमारी ई-मेल खोल के देख सकती है, बैंकों में हमारे लेन-देन को देख सकती है, और हमें डरा कर चुप कराने की कोशिश कर सकती है। सरकार डरपोक मीडिया के सहयोग से सूचना को नियंत्रित कर सकती है। सिर्फ इसी कारण जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की लोकप्रियता (जिनसे पूछा गया उनका 33%) – 2006 तक आते-आते घटती हुई, पर फिर भी काफी – बनी हुई है। लेकिन यह नियंत्रण हमेशा के लिए नहीं है। यह बात कि मीडिया का 95% ईराक पर कब्ज़ा बनाए रखने के पक्ष में है (ऐसा कैसे किया जाए इसकी केवल ऊपरी निंदा करते हुए), जबकि 50% से ज़्यादा जनता वापसी के पक्ष में है, दिखाती है कि शासकीय झूठों के प्रति सामान्य बोध पर आधारित विरोध मौजूद है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि जनमत (अपने स्वभाव के अनुसार) कितने नाटकीय तरीके से अचानक बदल सकता है। याद करें कि बड़े जॉर्ज बुश के लिए जन समर्थन कितनी तेज़ी से खत्म हो गया था जैसे ही खाड़ी युद्ध में जीत की गर्मी कम हुई थी और आर्थिक परेशानियों की असलियत सामने आ गई थी।

याद करें कि वियतनाम युद्ध के शुरू में किस तरह 1965 में दो-तिहाई अमरीकन युद्ध के पक्ष में थे। कुछ ही वर्ष बाद दो-तिहाई अमरीकन युद्ध का विरोध कर रहे थे। उन तीन या चार वर्षों में ऐसा क्या हो गया? धीरे-धीरे प्रॉपेगंडा तंत्र की दरारों से सच का रिसना – यह समझना कि हमसे झूठ बोला गया था, हमें धोखा दिया गया था। जब मैं यहाँ अमरीका में 2006 की गर्मियों में यह लेख लिख रहा हूँ, तब भी यही हो रहा है। घबरा जाना, या इस बात को अपने ऊपर हावी होने देना कि युद्ध पैदा करने वालों के पास ज़बरदस्त ताकत है, आसान है। लेकिन कुछ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य उपयोगी हो सकता है, क्योंकि यह हमें बताता है कि इतिहास में ऐसे बिन्दु भी होते हैं जब सरकारों को पता चलता है कि उनकी सारी ताकत जागरूक हो चुके नागरिकों के विरुद्ध बेकार है।

सरकारों में एक मूलभूत कमज़ोरी होती है, चाहे उनके पास कितनी ही ढेर सारी सेनाएँ हों, चाहे कितनी ही दौलत उनके पास हो, चाहे छवियों और सूचना पर उनका नियंत्रण हो, क्योंकि उनकी ताकत नागरिकों, सैनिकों, अफ़सरों, तथा पत्रकारों और लेखकों और अध्यापकों और कलाकारों के आज्ञाकारी होने पर निर्भर करती है। जब नागरिकों को यह शक होने लगता है कि उन्हे धोखा दिया गया है और वे समर्थन वापस ले लेते हैं, तब सरकार की वैधता और उसकी शक्ति खत्म हो जाती है।

पिछले दशकों में हमने पूरे विश्व में यह सब होते देखा है। एक दिन जागने पर राजधानी की गलियों में लाखों गुस्साए लोगों को देख कर देश के नेताओं को अपना बोरिया-बिस्तर बांधते हुए और एक हेलीकॉप्टर की पुकार करते हुए। यह फ़ंतासी नहीं है; यह अभी हाल ही का इतिहास है। यह इतिहास है फ़िलीपीन का, इंडोनेशिया का, यूनान का, पुर्तगाल और स्पेन का, रूस, पूर्वी जर्मनी, पोलैंड, हंगरी तथा रोमानिया का। अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका और उन तमाम जगहों के बारे में सोचें जहाँ बदलाव होना असंभव लग रहा था पर हो गया। निकारागुआ में सोमोज़ा को अपने हवाई जहाज की तरफ दौड़ते हुए याद करें, फ़र्डीनांड और इमेल्डा मार्कोस को जल्दी-जल्दी अपने गहने और कपड़े संभालते हुए याद करें, ईरान के शाह को हताशा के साथ उस देश की खोज करते हुए याद करें जो उसे लेने को तैयार हो जबकि वह तेहरान में भीड़ से बचने के लिए भाग रहा था, हेती में दुवालिये को वहाँ की जनता के कोप से बचने के लिए मुश्किल से पतलून पहनते हुए याद करें।

हम यह उम्मीद तो नहीं कर सकते कि जॉर्ज बुश को हेलीकॉप्टर में भागना पड़े। पर हम उन्हें राष्ट्र को दो युद्धों में ढकेलने के लिए, इस देश तथा अफ़ग़ानिस्तान व ईराक़ मे दसियों हज़ार मनुष्यों की मृत्यु या उनके विकलांग होने के लिए, और अमरीकी संविधान तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार तो ठहरा सकते हैं। निश्चय ही ऐसी कार्यवाहियाँ महाभियोग के लिए “भारी अपराध तथा कुकृत्य” कहलाने लायक हैं।

और देश भर में लोगों ने वास्तव में उनके विरूद्ध महाभियोग लगाने की मांग करना शुरू कर भी दिया है। हाँ, बुजदिल कांग्रेस से तो हम उन पर महाभियोग लगाने की उम्मीद नहीं ही कर सकते। कांग्रेस एक इमारत में अवैध प्रवेश करने के लिए निक्सन पर महाभियोग चलाने को तैयार थी, पर वो एक देश में अवैध प्रवेश के लिए बुश पर महाभियोग नहीं चलाएगी। वे क्लिंटन पर यौन कारनामों के लिए महाभियोग चलाने को तैयार थे, पर वे एक देश की धन-संपत्ति को महाधनियों के हवाले करने के लिए बुश पर महाभियोग नहीं चलाएंगे।

बुश प्रशासन की तसल्ली को लगातार भीतर ही भीतर एक कीड़ा खा रहा है: अमरीकन जनता की यह जानकारी – बहुत कम गहरी कब्र में दफ़न की हुई, आसानी से बाहर लाई जा सकने वाली – कि उसकी सरकार जनमत से नहीं बल्कि एक राजनैतिक तख्ता पलट से सत्ता में आई थी। इसलिए हो सकता है कि हम इस प्रशासन की वैधता को धीरे-धीरे विखंडित होते हुए देख रहे हों, इसके चरम आत्मविश्वास के बावजूद। साम्राज्यवादी ताकतों के अपनी जीतों पर इतराने का लंबा इतिहास है, अपनी पहुँच से ज्यादा खिंच जाने का और दुस्साहसी बन जाने का, और यह न समझने का कि ताकत सिर्फ़ हथियारों और पैसे से नहीं होती। सैनिक ताकत की अपनी सीमा होती है – मानवों द्वारा निर्धारित सीमा, उनके न्याय बोध तथा प्रतिरोध की क्षमता से निर्धारित सीमा। अपने 10,000 नाभिकीय बमों के बावजूद संयुक्त राज्य अमरीका कोरिया या वियतनाम में युद्ध नहीं जीत सका, क्यूबा या निकारागुआ में क्रांति को नहीं रोक सका। इसी तरह सोवियत संघ को अपने नाभिकीय बमों तथा विशाल सेना के बावजूद अफ़ग़ानिस्तान से लौटने के लिए बाध्य होना पड़ा।

सैनिक शक्ति से लैस देश विनाश तो कर सकता है पर निर्माण नहीं कर सकता। इसके नागरिक व्यग्र हो रहे हैं क्योंकि उनकी मौलिक दैनिक ज़रूरतों को सैनिक गौरव के लिए बलि चढ़ाया जा रहा है जबकि उनके युवा बच्चों का ख्याल नहीं रखा जा रहा और उन्हें युद्ध में भेजा जा रहा है। उनकी व्यग्रता रोज़ बढ़ती जा रही है और नागरिक अधिकाधिक संख्याओं में इकट्टे हो रहे हैं, इतने कि उनको नियंत्रण में रखना मुश्किल होता जा रहा है; एक न एक दिन ऊपर से भारी साम्राज्य गिर पड़ते हैं। जन चेतना में बदलाव हल्के असंतोष से शुरू होता है, शुरू में अस्पष्ट सा, सरकार की नीतियों और असंतोष में बिना कोई संबंध समझे। फिर बिन्दु जुड़ने लगते हैं, नाराज़गी बढ़ने लगती है, और लोग विरोध में बोलने लगते हैं, संगठित होने लगते हैं, तथा विरोध की कार्यवाहियाँ शुरू कर देते हैं।

आज, जब संघ के हर राज्य में बजट में कमी की जा रही है, पूरे देश में अध्यापकों, नर्सों, चिकित्सा, तथा सस्ते घरों का अभाव महसूस हो रहा है। एक अध्यापक ने हाल ही में बॉस्टन ग्लोब को लिखा: “मैं बॉस्टन के उन 600 अध्यापकों में से हो सकता हूँ जिन्हें बजट में कमी के कारण नौकरी से निकाला जाने वाला है।” फिर यह पत्र लेखक इस बात को बमों पर खर्च किए गए पैसे से जोड़ता है जिसे, उसके शब्दों में, “मासूम ईराक़ी बच्चों को बग़दाद में अस्पताल भेजने के लिए लगाया जा रहा है।”

जब सरकारों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, सेनाओं तथा पुलिस की दिमागों को नियंत्रित करने, असहमति को कुचलने, और विद्रोह को नष्ट करने की विशाल ताकत हमारी सोच पर हावी हो जाए तब हमें कुछ ऐसी चीज़ों पर ध्यान देना चाहिए जो मुझे रोचक लगती हैं। जिनके पास इतनी भारी ताकत है वे इस ताकत पर अपनी पकड़ बनाए रखने के बारे में आश्चर्यजनक रूप से चिंतित हैं। उनकी प्रतिक्रिया विरोध के बहुत ही छोटे और निरापद से दिखने वाले आसारों की तरफ भी लगभग हिस्टीरियाई होती है।

हम ताकत की हज़ार परतों से लैस अमरीकी सरकार को देख सकते हैं, कुछ शांतिवादियों को जेल में डालने या किसी लेखक को देश से बाहर रखने के लिए कड़ी मेहनत करते हुए। हम व्हाइट हाउस के सामने धरना दे रहे अकेले आदमी की तरफ निक्सन की हिस्टीरियाई प्रतिक्रिया को याद कर सकते हैं: “इसे पकड़ो!”

क्या ऐसा संभव है कि जो लोग सत्ता में हैं वो कुछ ऐसा जानते हैं जो हम नहीं जानते? शायद वे अपनी सीमाएँ जानते हैं। शायद वो समझते हैं कि छोटे आंदोलन ही बड़े आंदोलन बन सकते हैं, कि जो विचार जनता में अपनी जगह बना ले उसे मिटाया नहीं जा सकता। लोगों को युद्ध का समर्थन करने, दूसरों का दमन करने के लिए राज़ी किया जा सकता है, पर इस तरफ उनका स्वाभाविक झुकाव नहीं होता। कुछ लोग “पहले पाप” की बात करते हैं। कुर्त वॉनेगट उसको चुनौती देते हुए “पहले पुण्य” की बात करते हैं।

इस देश में लाखों लोग हैं जो वर्तमान युद्ध के विरुद्ध हैं। जब आप एक आँकड़ा देखते हैं “40% अमरीकन लोग युद्ध का समर्थन करते हैं,” तो उसका मतलब होता है कि 60% अमरीकन समर्थन नहीं करते। मुझे यकीन है कि युद्ध का विरोध करने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जाएगी जबकि युद्ध समर्थकों की संख्या घटती जाएगी। इस रास्ते पर कलाकार, संगीतकार, लेखक, और सांस्कृतिक कार्यकर्ता शांति व न्याय के लिए आंदोलन को एक खास भावनात्मक तथा आध्यात्मिक ताकत दे सकते हैं। विद्रोह अक्सर एक सांस्कृतिक चीज़ के रुप में शुरू होता है।

चुनौती अब भी बाकी है। विरोधी पक्ष के पास बहुत सी ताकतें हैं: पैसा, राजनैतिक शक्ति, अधिकतर मीडिया। हमारी तरफ है दुनिया की जनता और पैसे व हथियारों से बड़ी एक ताकत: सच। सच की अपनी ताकत होती है। कला की अपनी ताकत होती है। संयुक्त राज्य तथा सभी जगहों में जन संघर्षों का असली मतलब है वही युगों पुराना पाठ – कि हम जो भी करते हैं उससे फ़र्क पड़ता है। एक कविता एक आंदोलन की प्रेरणा बन सकती है। एक पर्चा क्रांति के लिए चिनगारी बन सकता है। नागरिक असहयोग लोगों को जगा सकता है और हमें सोचने के लिए उकसा सकता है। जब हम एक-दूसरे के साथ संगठित हो जाते हैं, जब हम शामिल हो जाते हैं, जब हम खड़े होकर साथ बोलने के लिए तैयार हो जाते हैं, तब हम ऐसी ताकत पैदा कर सकते हैं जिसे कोई सरकार दबा नहीं सकती।

हम रहते तो एक खूबसूरत देश में हैं। लेकिन ऐसे लोगों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया है जो मानव जीवन, आज़ादी या न्याय की कोई कद्र नहीं करते। अब यह हमारा काम है कि हम इसे दुबारा पा लें।

अनुवादक: अनिल एकलव्य
अनुवाद तारीख: 19 दिसंबर, 2006

Original Article at ZCommunications