भाव खाना

कुछ लोगों को भवसागर में आने से लेकर
भवसागर पार हो जाने तक लगातार
बहुत चाव से भाव खिलाया जाता है
यहाँ तक कि कभी-कभी तो उनको
भाव ही बहुत सस्ता लगने लगता है

कुछ और लोग होते हैं जो आने के बाद
कभी, कहीं, किसी तरह दूसरे लोगों से
भाव खाने का हक हासिल कर लेते हैं

ऐसे लोगों की तो गिनती ही नहीं है जो
बावर्दी या मुफ़्ती, तलवार से या मीठी छुरी से
बहुतों से बहुत सा भाव छीनने के एवज में
अपने लिए भी और अपनों के लिए भी
अपने और अपनों के सपनों के लिए भी
जितना हो सके भाव का इनाम पा लेते हैं

ऐसे भी होते हैं जिन्हें घूमते-घामते ही
हालात का चक्का बिना किसी कारण
औरों से भाव खाने का परमिट दे जाता है

बाकी रहे वो जिन्हें काव-काव करके
अपनी ज़बान तमाम जला डालने
या मुँह ही सिलने-सिलवा-लेने पर भी
कोई रत्ती भर भाव देने को राज़ी नहीं होता

उन्हें तहज़ीब को ऊपर ताक पर रख कर
पालथी मार कर और हाथ धो-धाकर
जो भी जितना भी जैसा भी और जब भी जुटे
रोकर हँस कर या बुद्धं शरणं सा भाव धर कर
खुद ही खुद को भाव खिलाना पड़ता है

The Roti Riddle

One link on one of the most frequent tags on this blog:

Kafka’s Castle is collapsing

And on a (slightly) different note:

Love in Sunnyvale

And to complete a trio (one for all, all for one), a sociological and ecological riddle with just a little bit of mathematics:

One man eats 1.9 meals a day and three rotis per meal. He leaves half a roti thrice a month, which gets thrown. Another man eats 2.9 meals a day and eight rotis per meal. He only leaves one roti once every three months, which he religiously feeds to a stray animal or to a beggar. Which one of the two men is more socially and ecologically responsible? The sizes and weights of the rotis remain the same for both.

पेट की चीख़

प्रतिक्षण प्रतीक्षा का प्रहार
साहबों के गले में फूलों का हार
बासी खिचड़ी और अधसड़ा अचार
प्यास से गठबंधित पेय
और भूख से हठबंधित आहार
चैन की नींद के फालूदे का जलता स्वाद

तृप्त शरीरों और तरोताज़ा चेहरों की गुफ़्तगू
नहा कर नये कपड़े पहने शब्दों का
मंजे हुए दांतों, घिसी हुई जीभों और धुले-पुंछे होंठों से लेकर
तौलिये से रगड़कर साफ़ किए हुए कानों तक
कुशल यातायात प्रणाली के तहत आवागमन

पाचन तंत्र के रसों से घायल आमाशय
और सूखी-जली आँतों का घुटता हुआ दम
नींद की कमी से तिलमिलाते मस्तिष्क का
गले से होकर उतरता ही जाता गुस्सा

पर मानवी सभ्यता के मंदिर में भी गूंजता
और बाकी सभी शब्दों को ढक लेता हुआ
एक आदिम, बल्कि पाशविक उद्गम का,
लेकिन एकदम सभ्य सुसंस्कृत सवाल —
मेरे पेट की चीख़ सुनी तो नहीं किसी ने?

[2009]

बरकत है भूख की

करतब के बर्तन में बरकत है भूख की
फिर भी ना खाए तो हरकत है मूर्ख की

करता है बरगद साल-दर-साल कदमताल
ये क़वायद है लेने को मरघट के हाल-चाल

सरपट चले जाने की यहाँ पर है परिपाटी
फ़ुरसत नहीं सोचें कितनी हरी थी ये घाटी

गफ़लत का मफ़लर रहता है गर्म हर दम
शर्म के लिहाफ़ के ना होने का क्यों हो ग़म

पनघट पर बिल्कुल भी नहीं मिलता है पानी
पानी तो पनघट से लाती थी नानी की नानी

खुदा का ये मुद्दा क्या नहीं लगता है बेहूदा
तदबीर और तकदीर की तस्वीर जो है बेहूदा

सवाल नहीं काफ़ी और जवाब भी नहीं काफ़ी
सवाल-जवाब जोड़ी में खरीद लाओ तो माफ़ी

दिल हलाक़, दिमाग़ क़त्ल, बदन से नहीं है सम
पल भर को लेने दो दम, साँस अब बची है कम

 

[2009]